सूरजपुर : नियम एक तरफ, कुर्सी दूसरी तरफ! सूरजपुर में मंडल संयोजक और छात्रावास प्रभार को लेकर शासन के निर्देश बेअसर, आखिर किसके संरक्षण में चल रही मनमानी? प्रमुख सचिव के आदेश के बाद भी वर्षों से जमे कर्मचारियों पर नहीं हुई कार्रवाई
सूरजपुर में कौन बचा रहा नियमों को चुनौती देने वालों को?
प्रमुख सचिव के पत्र ने खोली परतें, अब जिले में बड़े प्रशासनिक फेरबदल की चर्चा तेज
चंद्रिका कुशवाहा,सूरजपुर
आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के हालिया निर्देशों ने सूरजपुर जिले की उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसकी चर्चा लंबे समय से विभागीय गलियारों में होती रही है। शासन ने स्पष्ट शब्दों में निर्देश जारी कर कहा है कि मंडल संयोजक जैसे महत्वपूर्ण पदों का प्रभार अन्य विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को नहीं दिया जाए, लेकिन सूरजपुर जिले में वर्षों से चली आ रही व्यवस्था अब भी सवालों के घेरे में है।
सूत्रों की मानें तो जिले में कई ऐसे मंडल संयोजक हैं जो मूलतः हेडमास्टर या अन्य संवर्ग के कर्मचारी हैं, लेकिन लंबे समय से मंडल संयोजक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यही नहीं, कई छात्रावासों और आश्रमों में भी कर्मचारी वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं। शासन के ताजा आदेश के बाद अब इन व्यवस्थाओं की वैधता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
दरअसल, आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि मंडल संयोजक का पद विभागीय सेटअप का महत्वपूर्ण हिस्सा है। छात्रावासों और आश्रमों के संचालन से लेकर विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन तक इस पद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में अन्य विभागों के कर्मचारियों को यह जिम्मेदारी देना प्रशासनिक दृष्टिकोण से उचित नहीं माना गया है।
शासन को यह भी जानकारी मिली थी कि कई जिलों में अन्य विभागों के कर्मचारियों को मंडल संयोजक का प्रभार दिया जा रहा है, जिसके कारण योजनाओं के संचालन में कठिनाइयां, शिकायतें और अनियमितताएं सामने आ रही हैं। यही वजह है कि शासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में मंडल संयोजक का पद रिक्त होने पर केवल वरिष्ठ छात्रावास अधीक्षक अथवा विभागीय लिपिक संवर्ग के कर्मचारियों को ही प्रभार दिया जाएगा।
सूरजपुर में क्यों नहीं हुआ पालन ?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शासन के निर्देश पहले भी जारी हो चुके थे, तब सूरजपुर में उनका पालन क्यों नहीं हुआ? वर्ष 2019-20 में भी सहायक संचालक शिक्षा, सरगुजा द्वारा हेडमास्टरों को मंडल संयोजक पद से हटाकर मूल पदस्थापना स्थल भेजने के निर्देश दिए गए थे। प्रदेश के कई जिलों में आदेश का पालन हुआ, लेकिन सूरजपुर में कई मामलों में स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई बताई जा रही है।
विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी जोरों पर है कि लंबे समय से एक ही पद और स्थान पर जमे रहने के कारण कुछ लोगों ने व्यवस्था पर मजबूत पकड़ बना ली है। इससे न केवल पारदर्शिता प्रभावित होती है बल्कि अन्य पात्र कर्मचारियों के अवसर भी सीमित हो जाते हैं।
क्या होगी बड़ी कार्रवाई ?
प्रमुख सचिव के ताजा आदेश के बाद अब यह माना जा रहा है कि जिले में मंडल संयोजकों, छात्रावास अधीक्षकों और अन्य प्रभारधारी कर्मचारियों की सूची की समीक्षा हो सकती है। यदि शासन के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई होती है तो कई वर्षों से जमे कर्मचारियों को हटाकर नई पदस्थापनाएं की जा सकती हैं।
अब निगाहें जिला प्रशासन, सहायक आयुक्त कार्यालय और संभागीय अधिकारियों पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या सूरजपुर में शासन के आदेशों का पालन कर वर्षों से चली आ रही व्यवस्था बदली जाएगी, या फिर नियमों और निर्देशों के बावजूद सब कुछ पहले की तरह चलता रहेगा? फिलहाल जिले में यही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है और आने वाले दिनों में इस मामले में बड़े प्रशासनिक फैसलों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

