CG Culture : बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली है। नारायणपुर जिले के पारंपरिक मांझी-चालकी व्यवस्था और ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता के विजेताओं का एक विशेष प्रतिनिधिमंडल हाल ही में नई दिल्ली पहुंचा, जहां उन्होंने राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति से शिष्टाचार मुलाकात की। इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने बस्तर की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय जीवनशैली की अनूठी विशेषताओं से राष्ट्रपति को अवगत कराया।
यह मुलाकात बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
बस्तर की परंपराओं का हुआ राष्ट्रीय सम्मान
राष्ट्रपति भवन में हुई इस मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने बस्तर की सदियों पुरानी जनजातीय परंपराओं, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की जानकारी साझा की। मांझी-चालकी व्यवस्था, जो जनजातीय समाज की पारंपरिक प्रशासनिक और सामाजिक प्रणाली मानी जाती है, उसके महत्व और भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
प्रतिनिधियों ने बताया कि यह व्यवस्था आज भी कई गांवों में सामाजिक समरसता और सामुदायिक निर्णयों का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।
‘बस्तर पंडुम’ ने दिलाई नई पहचान
प्रतिनिधिमंडल में शामिल सदस्य ‘बस्तर पंडुम’ प्रतियोगिता के विजेता भी रहे। यह आयोजन बस्तर की पारंपरिक संस्कृति, लोकनृत्य, लोकगीत, वेशभूषा और जनजातीय जीवनशैली को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित किया जाता है।
इस मंच के माध्यम से स्थानीय कलाकारों और पारंपरिक समुदायों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।
लोक कला और सांस्कृतिक विरासत से कराया परिचय
मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को बस्तर की प्रसिद्ध लोक कलाओं, हस्तशिल्प, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन की विशेषताओं के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अमूल्य धरोहर है।
इस अवसर पर जनजातीय समुदाय की कला, परंपरा और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की भी सराहना की गई।
जनजातीय संस्कृति के संरक्षण का संदेश
प्रतिनिधिमंडल ने इस मुलाकात को बस्तर के लिए गौरव का क्षण बताते हुए कहा कि इससे जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस तरह के प्रयासों से पारंपरिक ज्ञान, लोक कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजनों से देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ती है और जनजातीय समाज की सकारात्मक छवि राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती है।

