नई दिल्ली। ईश्वर की सच्ची भक्ति केवल मंदिर जाने, व्रत रखने या धार्मिक अनुष्ठान करने तक सीमित नहीं है। वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने एक प्रवचन में बताया कि भगवान की सबसे बड़ी पूजा किसी भी व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुंचाना है। उनका यह संदेश सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।
भक्त के सवाल पर दिया सरल और गहरा जवाब
प्रवचन के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि, “भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है?” इस पर महाराज ने कहा कि सच्ची पूजा वही है, जिसमें व्यक्ति किसी भी जीव को अपने मन, वाणी और शरीर से दुख न पहुंचाए।
उन्होंने कहा कि न तो हमारी वाणी से किसी का दिल दुखना चाहिए, न हमारे कर्मों से किसी को हानि पहुंचनी चाहिए और न ही मन में किसी के प्रति द्वेष या बुरा भाव रखना चाहिए। यही भगवान की सबसे बड़ी आराधना है।
रामचरितमानस की चौपाई से समझाया संदेश
प्रेमानंद महाराज ने अपने उत्तर को श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई के माध्यम से भी समझाया—
“पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥”
इस चौपाई का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों की भलाई से बड़ा कोई धर्म नहीं है और किसी को कष्ट पहुंचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं।
भलाई ही सबसे बड़ी भक्ति
महाराज ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति नियमित पूजा-पाठ, व्रत या तीर्थयात्रा करता है, लेकिन उसके व्यवहार से दूसरे लोगों को दुख पहुंचता है, तो ऐसी भक्ति का वास्तविक महत्व कम हो जाता है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति बिना दिखावे के दूसरों की सहायता करता है, मधुर वाणी बोलता है और सभी के प्रति करुणा का भाव रखता है, तो वह ईश्वर के अधिक निकट होता है।
प्रेम, करुणा और सेवा का दिया संदेश
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, सच्ची भक्ति का आधार प्रेम, दया, सेवा और सद्भाव है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने व्यवहार में सकारात्मकता लाएं, दूसरों की सहायता करें और किसी के प्रति दुर्भावना न रखें। उनका कहना है कि यही जीवन को सार्थक बनाने और ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग है।

