आखिर किसके आदेश पर चलेगा प्रतापपुर शिक्षा विभाग? सात साल से प्रभारी व्यवस्था, नए आदेश के बाद भी बरकरार पुरानी पकड़! कर्मचारी असमंजस में, पुराने विवाद और शिकायतें फिर चर्चा में
चंद्रिका कुशवाहा , सूरजपुर
प्रतापपुर विकासखंड का शिक्षा विभाग इन दिनों एक ऐसे प्रशासनिक संकट के बीच खड़ा है, जिसने पूरे जिले में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की कुर्सी को लेकर ऐसी स्थिति बन गई है कि शिक्षक और कर्मचारी खुद यह तय नहीं कर पा रहे कि आखिर विभाग में वैध आदेश किसका माना जाए।
जानकारी के अनुसार, सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी (एबीईओ) के मूल पद पर पदस्थ मुन्नूलाल धुर्वे पिछले करीब सात वर्षों से प्रभारी बीईओ का दायित्व संभाल रहे हैं। इसी बीच स्कूल शिक्षा विभाग ने व्याख्याता अरुण कुमार पांडेय को प्रभारी बीईओ नियुक्त करते हुए आदेश जारी किया। विभागीय सूत्रों के अनुसार श्री पांडेय ने ज्वाइनिंग भी दे दी है, लेकिन अब तक उन्हें विधिवत प्रभार नहीं सौंपा गया है।
यही वह बिंदु है, जहां से कई सवाल खड़े होने लगे हैं। यदि शासन ने नया आदेश जारी कर दिया है, तो फिर चार्ज हस्तांतरण क्यों नहीं हो रहा? क्या कोई प्रशासनिक अड़चन है, या मामला किसी अन्य वजह से अटका हुआ है? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।
सूत्रों का दावा है कि दोनों अधिकारियों की ओर से अलग-अलग व्हाट्सएप समूहों में निर्देश जारी किए जा रहे हैं। इससे प्राचार्य, शिक्षक और कर्मचारियों के सामने गंभीर असमंजस की स्थिति बन गई है। यदि दोनों ओर से अलग-अलग निर्देश मिलेंगे तो पालन किसका किया जाए? भविष्य में यदि किसी आदेश की अवहेलना मान ली गई तो जिम्मेदार कौन होगा?
इस पूरे घटनाक्रम ने पुराने विवादों को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। मुन्नूलाल धुर्वे के लंबे समय तक एक ही स्थान पर प्रभारी बीईओ बने रहने को लेकर पूर्व में कई शिकायतें जिला प्रशासन, संभाग आयुक्त और स्कूल शिक्षा विभाग तक भेजी जा चुकी हैं। शिकायतों में शासन की स्थानांतरण नीति के उल्लंघन, निरीक्षण कार्यों में कमी तथा विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न आरोप लगाए गए थे। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना शेष है।
चर्चा यह भी है कि वर्ष 2025 में आयोजित समीक्षा बैठक के दौरान तत्कालीन कलेक्टर ने उनके विरुद्ध निलंबन प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए थे। उस कार्रवाई की वर्तमान स्थिति क्या है, यह भी अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी है।
अब सवाल केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। यदि नए प्रभारी बीईओ की नियुक्ति विधिवत की गई है तो उन्हें तत्काल प्रभार क्यों नहीं दिया जा रहा? यदि चार्ज रोकने का कोई वैधानिक कारण है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? और यदि कोई कारण नहीं है, तो फिर शासन के आदेश के पालन में देरी किस आधार पर हो रही है?
प्रतापपुर जैसे बड़े विकासखंड में वर्षों से नियमित बीईओ की नियुक्ति नहीं होना पहले ही चिंता का विषय रहा है। अब दोहरी प्रशासनिक स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था को और उलझा दिया है। शिक्षकों और कर्मचारियों का कहना है कि शासन को तत्काल स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि विभाग में आदेशों को लेकर बना भ्रम समाप्त हो और प्रशासनिक व्यवस्था सामान्य हो सके।
अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग पर टिकी हैं। देखना होगा कि नए आदेश का पूर्ण पालन होता है या फिर बीईओ की कुर्सी पर बना यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा रूप लेता है।

