चंदौली। जलस्रोतों को अतिक्रमण-मुक्त करने का अभियान तो प्रशासन बड़े जोश से चला रहा है। शनिवार को अलीनगर में तालाब की सरकारी भूमि पर बुलडोजर दौड़ाकर ‘सख्ती’ का प्रदर्शन भी कर लिया गया। तारीफ की बात। लेकिन उसी अलीनगर में महज कुछ ही दूरी पर एक सरकारी नाले का लगभग 12 मीटर चौड़ा हिस्सा पिछले छह महीने से लगातार मिट्टी से पटा जा रहा है निर्माण हो रहा है और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नाला धीरे-धीरे ‘गायब’ होता जा रहा है।
यहाँ प्रशासन की ‘सक्रियता’ अचानक ‘गहन चिंतन’ में बदल जाती है।
कानूनी नजरिया: साफ है, लेकिन लागू कहाँ?
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 67 स्पष्ट रूप से सार्वजनिक भूमि, तालाब, पोखर,नाले और जल स्रोतों पर अतिक्रमण हटाने का अधिकार तहसीलदार को देती है। धारा 26-A (विकास क्षेत्रों में) अतिक्रमण को संज्ञेय अपराध मानती है – सजा हो सकती है। नाले को पाटना न केवल राजस्व कानून का उल्लंघन है बल्कि जल निकासी बाधित होने से बाढ़ का खतरा बढ़ाना भी पर्यावरण और आपदा प्रबंधन कानूनों का मामला बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट बार-बार कह चुके हैं कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण हटाना प्रशासन की बाध्यता है न कि ‘विवेकाधीन’ फैसला। फिर भी जब शिकायतें आईजीआरएस पर दर्ज होती हैं मीडिया में मामला उठता है अपर जिलाधिकारी निर्देश देते हैं, टीम निरीक्षण करती है – और फिर सब ‘फाइलों में दब’ जाता है तो सवाल उठता ही है।
क्या कानून भी ‘व्यक्ति-विशेष’ देखता है?
यह महज ‘दोहरे मापदंड’ की कहानी नहीं है। यह चुनिंदा निष्क्रियता की कहानी है।
एक तरफ छोटे-मोटे तालाब के कब्जे पर तुरंत बुलडोजर। दूसरी तरफ सरकारी नाले को महीनों से ‘विकसित’ करते देखकर प्रशासन की आँखें बंद। स्थानीय लोग चीख-चीखकर बता रहे हैं लेकिन जिम्मेदार विभाग ‘मौन व्रत’ पर हैं।
क्या कारण? शायद कब्जाधारी का ‘प्रभाव’ इतना है कि नाले का पानी भी रुक जाता है, लेकिन कार्रवाई की धारा नहीं बहती। यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ लोग कानून के ‘ऊपर’ और कुछ ‘नीचे’ होते हैं। आम आदमी के लिए नियम, प्रभावशालियों के लिए ‘विशेष परिस्थितियाँ’।
प्रशासन अगर सच में जलस्रोत बचाना चाहता है तो दोनों मामलों में समान सख्ती दिखाए। नाले पर छह महीने की देरी न केवल लापरवाही है, बल्कि कानूनी कदाचार की ओर इशारा करती है। Article 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन।

