बिलासपुर : हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: व्याख्याता को बीईओ का प्रभार देने का आदेश निरस्त
बिलासपुर,
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बलौदा के खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) पद का अतिरिक्त प्रभार एक व्याख्याता को सौंपने संबंधी आदेश को नियमों और कानून के विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षकीय संवर्ग के कर्मचारियों को प्रशासनिक पदों का प्रभार नहीं दिया जा सकता तथा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में केवल उन्हीं विशेष परिस्थितियों में लगाया जा सकता है, जिनका प्रावधान बच्चों के निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में किया गया है।
मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ में हुई। यह याचिका बलौदा के प्रभारी खंड शिक्षा अधिकारी रवि कुमार गौतम द्वारा दायर की गई थी।
याचिका में बताया गया कि रवि कुमार गौतम सहायक खंड शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं और उन्हें प्रभारी बीईओ का दायित्व सौंपा गया था। इसके बावजूद स्कूल शिक्षा विभाग ने 10 जून 2026 को आदेश जारी कर पीएमश्री स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल, बलौदा के प्रभारी प्राचार्य एवं व्याख्याता अनिल कुमार शर्मा को बीईओ का अतिरिक्त प्रभार दे दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि बीईओ का पद प्रशासनिक संवर्ग का पद है। छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक पद संवर्ग) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2026 के अनुसार इस पद पर नियुक्ति निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया और पात्र अधिकारियों के माध्यम से ही की जा सकती है। नियमों के तहत बीईओ के 75 प्रतिशत पद सहायक खंड शिक्षा अधिकारियों की पदोन्नति से तथा 25 प्रतिशत पद पात्र प्राचार्यों से भरे जाने का प्रावधान है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अनिल कुमार शर्मा मूल रूप से व्याख्याता हैं और शिक्षकीय संवर्ग से संबंधित हैं। उन्हें केवल प्रभारी प्राचार्य का अतिरिक्त दायित्व दिया गया था, जिससे वे प्रशासनिक संवर्ग का हिस्सा नहीं बन जाते। ऐसे में उन्हें बीईओ जैसे प्रशासनिक पद का प्रभार सौंपना सेवा नियमों के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा जारी आदेश न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन करता है, बल्कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम की मंशा के भी प्रतिकूल है। न्यायालय ने 10 जून 2026 के आदेश को अवैध और विधि विरुद्ध मानते हुए तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।
इस फैसले को स्कूल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भविष्य में शिक्षकीय संवर्ग और प्रशासनिक संवर्ग के बीच स्पष्ट विभाजन सुनिश्चित होगा।

