बार-बार शिकायत, फिर भी कार्रवाई नहीं… प्रतापपुर की शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, पहाड़करवा स्कूल की शिकायत ने खोली मॉनिटरिंग की पोल, बीईओ की कार्यप्रणाली पर फिर उठे सवाल, ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
चंद्रिका कुशवाहा, सूरजपुर
प्रतापपुर विकासखंड की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। ग्राम पंचायत पहाड़करवा के सरपंच, पंच एवं ग्रामीणों द्वारा विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) को सौंपे गए लिखित शिकायत पत्र ने न केवल एक विद्यालय की स्थिति उजागर की है, बल्कि पूरे विकासखंड में शिक्षा व्यवस्था की मॉनिटरिंग पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। शिकायत में सहायक शिक्षक पर विद्यालय में कथित रूप से नशे की हालत में पहुंचने, बच्चों के साथ अभद्र व्यवहार करने तथा शिक्षण कार्य प्रभावित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई की मांग की है।

प्रतापपुर विकासखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर यह पहला मामला नहीं है। स्थानीय स्तर पर विकासखंड शिक्षा अधिकारी मुन्नूलाल ध्रुव की कार्यप्रणाली और विद्यालयों की कमजोर मॉनिटरिंग को लेकर पूर्व में भी कई शिकायतें सामने आ चुकी हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कलेक्टर स्तर से भी उनके विरुद्ध निलम्बन कार्रवाई के लिए सरगुजा संभाग आयुक्त को अनुशंसा भेजी जा चुकी है, लेकिन वर्षों बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में पहाड़करवा की घटना ने एक बार फिर विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय निरीक्षण के दौरान संबंधित सहायक शिक्षक कथित रूप से नशे की हालत में मिले। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि बच्चों ने बताया कि शिक्षक प्रतिदिन शराब के नशे में विद्यालय आते हैं, ठीक से पढ़ाने की स्थिति में नहीं रहते और उनके साथ अभद्र व्यवहार करते हैं। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल सेवा अनुशासन का उल्लंघन नहीं बल्कि बच्चों के शिक्षा के अधिकार के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी विद्यालय में लंबे समय से ऐसी स्थिति बनी हुई थी तो विकासखंड शिक्षा अधिकारी की नियमित मॉनिटरिंग आखिर कहां थी। शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी केवल कार्यालय संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यालयों का नियमित निरीक्षण, शिक्षकों की उपस्थिति, शिक्षण गुणवत्ता, बच्चों के सीखने के स्तर तथा शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी भी उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि समय-समय पर प्रभावी निरीक्षण होता तो ग्रामीणों को शिकायत लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाने की नौबत शायद नहीं आती।
ग्रामीणों का आरोप है कि विकासखंड के कई विद्यालयों में पढ़ाई भगवान भरोसे चल रही है। नियमित निरीक्षण के अभाव में अनुशासन कमजोर पड़ रहा है और कुछ स्थानों पर शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि एक के बाद एक शिकायतें सामने आती रहती हैं, जिससे अभिभावकों में भी चिंता बढ़ रही है।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि केवल संबंधित शिक्षक की जांच तक मामला सीमित न रखा जाए, बल्कि पूरे विकासखंड की शिक्षा व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। उनका कहना है कि यदि किसी विद्यालय में इस प्रकार की शिकायत सामने आती है तो संबंधित निगरानी अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, ताकि जिम्मेदारी तय हो सके।
शिक्षा से जुड़ी अन्य व्यवस्थाओं को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता, बच्चों की नियमित उपस्थिति, शैक्षणिक स्तर तथा शासन की विभिन्न योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी लगातार निगरानी की आवश्यकता है। यदि इन बिंदुओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो इसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ेगा।
विद्यालय केवल भवन नहीं होता, बल्कि बच्चों के सपनों की पहली पाठशाला होता है। ऐसे में यदि शिक्षक पर नशे की हालत में विद्यालय आने जैसे आरोप लगते हैं और विभागीय मॉनिटरिंग पर भी सवाल उठते हैं तो यह पूरे शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। शासन शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, लेकिन यदि जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर रहेगी तो योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
अब निगाहें शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हैं। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सत्य सिद्ध होते हैं तो संबंधित शिक्षक के साथ-साथ यह भी देखा जाना आवश्यक होगा कि क्या नियमित निरीक्षण और प्रशासनिक निगरानी में कोई चूक हुई है। निष्पक्ष जांच, तथ्य आधारित कार्रवाई और जवाबदेही तय करना ही शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम होगा।

