नई दिल्ली। देश में ‘नारी शक्ति’ को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। Association for Democratic Reforms (ADR) और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की ताजा रिपोर्ट ने राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी महज 10 प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है। यह स्थिति तब है, जब देश में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ पारित हो चुका है।
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चुनावी टिकटों में महिलाओं की अनदेखी
ADR के विश्लेषण के अनुसार, चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित है। देशभर में चुनाव लड़ने वाले कुल उम्मीदवारों में से केवल 10 प्रतिशत महिलाएं ही होती हैं। कई निर्वाचन क्षेत्रों में तो महिला उम्मीदवारों की संख्या शून्य तक रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में से सिर्फ 464 महिलाएं हैं, जो इस असमानता को साफ तौर पर दर्शाता है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के दावों के बावजूद टिकट वितरण में पुरुषों का दबदबा बना हुआ है।
स्थानीय स्तर पर बेहतर, लेकिन मुख्यधारा में संघर्ष
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाएं सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में प्रवेश करना उनके लिए अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
क्या आरक्षण से बदलेगी तस्वीर?
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के बाद उम्मीदें जरूर जगी हैं, लेकिन आम लोगों का मानना है कि केवल कानून बना देने से बदलाव नहीं आएगा। राजनीतिक दलों की सोच और टिकट वितरण की नीति में बदलाव लाना जरूरी है, तभी ‘आधी आबादी’ को उनका उचित प्रतिनिधित्व मिल पाएगा।

