करोड़ों के निर्माण पर संभागीय जांच का हथौड़ा : एकलव्य विद्यालय निर्माण में खुली चौकानें वाली परतें! खामियों का जाल देख हैरान रह गई टीम, झुके बीम, संदिग्ध हजारों ट्रैक्टर रेत और अधूरे रिकॉर्ड ने बढ़ाई जिम्मेदारों की बेचैनी
चंद्रिका कुशवाहा की खास रिपोर्ट,सूरजपुर
प्रतापपुर- सरनापारा स्थित निर्माणाधीन एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आने की चर्चा है। संभागायुक्त द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने मौके पर पहुंचकर निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी मानकों, दस्तावेजों और खनिज उपयोग की गहन जांच की। निरीक्षण के दौरान शिकायत में बताए गए बिंदुओं से भी अधिक गंभीर खामियां मिलने की बात सामने आ रही है, जिससे करोड़ों की इस परियोजना पर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्रतापपुर-सरनापारा में करोड़ों रुपये की लागत से निर्माणाधीन एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित संभागीय जांच दल के पहुंचते ही पूरे परिसर में हड़कंप मच गया। शिकायत के आधार पर शुरू हुई जांच के दौरान जो तस्वीर सामने आई, उसने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रिका कुशवाहा एवं मनीष गुप्ता द्वारा सरगुजा संभाग आयुक्त को भेजी गई शिकायत के बाद 13 जून 2026 को तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। समिति में उपायुक्त (विकास) सरगुजा संभाग को अध्यक्ष, अधीक्षण अभियंता ग्रामीण यांत्रिकी विभाग को सदस्य तथा जिला खनिज अधिकारी को सदस्य-सचिव बनाया गया था।
बुधवार को जांच टीम ने निर्माणाधीन परिसर का घंटों तक निरीक्षण किया। सूत्रों के अनुसार जांच केवल शिकायत में उल्लिखित बिंदुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि मौके पर कई ऐसी खामियां भी सामने आईं जिन पर टीम ने विशेष रुचि दिखाई। बताया जा रहा है कि बालक छात्रावास भवन के कुछ हिस्सों में बीम झुके हुए दिखाई दिए, जबकि किचन भवन की संरचना में भी तकनीकी असंतुलन को लेकर सवाल उठे। टीम ने इन सभी बिंदुओं का भौतिक सत्यापन किया।
निर्माण कार्य में उपयोग की गई जाली और सरिया को लेकर भी गंभीर आपत्तियां सामने आईं। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जहां स्लैब ढलाई में निर्धारित दूरी पर जाली बिछाई जानी चाहिए थी, वहां कई स्थानों पर मानकों से अधिक दूरी रखी गई। वहीं बीमों में निर्धारित संख्या से कम सरिया उपयोग किए जाने की भी शिकायत थी। जांच टीम ने इन बिंदुओं की तकनीकी जांच की और संबंधित अभिलेखों का परीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े कई सवाल भी उठे। ईंट जोड़ाई, ढलाई की गुणवत्ता तथा क्योरिंग प्रक्रिया को लेकर शिकायतकर्ताओं ने आपत्ति दर्ज कराई। आरोप है कि निर्माण कार्य में आवश्यक तकनीकी निगरानी के बजाय जल्दबाजी दिखाई गई, जिससे भवन की दीर्घकालिक मजबूती प्रभावित हो सकती है।
दस्तावेजों की जांच के दौरान भी स्थिति संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। टीम ने निर्माण से जुड़े तकनीकी रिकॉर्ड, गुणवत्ता नियंत्रण रजिस्टर और सामग्री उपयोग से संबंधित दस्तावेज मांगे, लेकिन कई अभिलेख तत्काल उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इससे जांच के दौरान नए सवाल खड़े हो गए।
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू रेत उपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि निर्माण कार्य में 4702 से अधिक ट्रैक्टर रेत उपयोग की गई, लेकिन उसके अनुरूप वैध पिटपास और रॉयल्टी दस्तावेज स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसी कारण जांच समिति में जिला खनिज अधिकारी को भी शामिल किया गया था।
निरीक्षण के दौरान मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में रही। कई श्रमिक बिना हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट और सुरक्षा उपकरणों के कार्य करते दिखाई दिए। यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है तो यह श्रम सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला माना जाएगा।
गौरतलब है कि यह विद्यालय भविष्य में सैकड़ों आदिवासी छात्र-छात्राओं का आवासीय शिक्षण केंद्र बनने वाला है। ऐसे में निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों की सुरक्षा और भविष्य से भी सीधे जुड़े हुए हैं।
अब पूरे क्षेत्र की निगाहें जांच समिति की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। सवाल यह है कि यदि जांच में तकनीकी खामियां और अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो क्या निर्माण कार्य पर रोक लगेगी, क्या स्वतंत्र स्ट्रक्चरल जांच कराई जाएगी और क्या जिम्मेदार अधिकारियों एवं एजेंसियों पर कार्रवाई होगी? इन सभी सवालों के जवाब अब संभागीय जांच रिपोर्ट के साथ सामने आएंगे।

