The Emergency of 1975 : नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे चर्चित और विवादास्पद अध्याय माने जाने वाले आपातकाल को आज 51 वर्ष पूरे हो गए हैं। 25 जून 1975 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लागू करने की घोषणा की थी। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक लगभग 21 महीनों तक जारी रहा।
क्यों लगाया गया था आपातकाल?
आपातकाल की पृष्ठभूमि में राजनीतिक और न्यायिक घटनाक्रम प्रमुख कारण माने जाते हैं। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली लोकसभा चुनाव में चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को सही ठहराते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया था। यह याचिका समाजवादी नेता राजनारायण ने दायर की थी।
अदालत के फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग तेज कर दी। देशभर में राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शनों का माहौल बनने लगा। इसी बीच 25 जून 1975 की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।
आपातकाल के दौरान क्या-क्या हुआ?
आपातकाल लागू होने के बाद देश में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले। इस दौरान चुनाव स्थगित कर दिए गए और नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। सरकार ने प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू कर दी, जिसके कारण समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को सरकारी अनुमति के बाद ही खबरें प्रकाशित करने की अनुमति थी।
सरकार विरोधी गतिविधियों पर सख्ती बरती गई और हजारों विपक्षी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित कई प्रमुख नेता शामिल थे।
प्रेस की स्वतंत्रता पर लगा अंकुश
आपातकाल के दौरान मीडिया पर अभूतपूर्व नियंत्रण देखने को मिला। समाचार पत्रों की सामग्री की निगरानी के लिए सेंसर अधिकारी नियुक्त किए गए थे। सरकार की आलोचना करने वाली रिपोर्टों और लेखों को प्रकाशित होने से पहले ही रोक दिया जाता था। इस दौर को भारतीय पत्रकारिता के सबसे कठिन समय में से एक माना जाता है।
आरके धवन के दावों ने बढ़ाई थी चर्चा
इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आरके धवन ने एक साक्षात्कार में दावा किया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने जनवरी 1975 में ही आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। धवन के अनुसार, इंदिरा गांधी इस्तीफा देने के लिए तैयार थीं, लेकिन उनके करीबी सहयोगियों ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी।
धवन ने यह भी कहा था कि आपातकाल केवल इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए नहीं लगाया गया था, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और प्रशासनिक चुनौतियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया था।
क्यों कहा जाता है लोकतंत्र का काला अध्याय?
आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का “काला अध्याय” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और नागरिक अधिकारों पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर आज भी इस दौर पर बहस होती है।
25 जून का दिन भारतीय राजनीति में लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के महत्व की याद दिलाता है। यही कारण है कि आपातकाल की वर्षगांठ हर साल देश के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बनी रहती है।

