बलरामपुर/वाड्रफनगर।
वाड्रफनगर तहसील न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 202404271100021 को लेकर न्यायिक प्रक्रिया और रिकॉर्ड संधारण की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ही प्रकरण में अलग-अलग तारीखों के दो आदेश सामने आने के दावे ने पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला दिया है।
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड में 10 सितंबर 2024 को दोनों पक्षों की अनुपस्थिति के आधार पर प्रकरण को खारिज कर दाखिल-दफ्तर किए जाने की जानकारी दर्ज है। लेकिन इसी प्रकरण में 18 जून 2024 का एक ऑफलाइन आदेश सामने आने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक ही केस में दो अलग-अलग आदेशों की स्थिति कैसे बनी?
18 जून के आदेश ने बढ़ाई पूरी कहानी की गंभीरता
दावा किया जा रहा है कि 18 जून 2024 को संबंधित दूसरे पक्ष को पर्याप्त सूचना दिए बिना एकतरफा आदेश पारित किया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों से जुड़ा गंभीर सवाल बन सकता है। हालांकि इसकी पुष्टि मूल केस फाइल, आदेशशीट, नोटिस और तामील रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच के बाद ही संभव होगी।
ऑनलाइन रिकॉर्ड से गायब क्यों रहा आदेश?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि 18 जून का आदेश विधिवत पारित हुआ था तो ऑनलाइन रिकॉर्ड में उसकी कार्यवाही क्यों नहीं दिखाई दे रही? क्या आदेशशीट में 18 जून की कार्यवाही दर्ज है? संबंधित पक्ष को नोटिस कब जारी हुआ? नोटिस की तामील किसके माध्यम से हुई? तामील रिपोर्ट में किसका हस्ताक्षर है? इन सवालों के जवाब अब जांच के केंद्र में हैं।
दूसरी ओर, यदि 10 सितंबर 2024 को दोनों पक्ष अनुपस्थित थे और प्रकरण खारिज कर दाखिल-दफ्तर किया गया, तो उससे पहले 18 जून को पारित कथित आदेश की वैधानिक स्थिति क्या थी—यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
मूल केस फाइल की जांच से खुलेगा पूरा राज
मामले में अब मूल केस फाइल, संपूर्ण आदेशशीट, नोटिस रजिस्टर, तामील रिपोर्ट, ऑनलाइन रिकॉर्ड और ऑफलाइन दस्तावेजों का मिलान कराने की मांग उठ रही है। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि दोनों आदेशों में तारीख, कार्यवाही और पक्षकारों की उपस्थिति को लेकर क्या-क्या दर्ज है।
यह मामला महज एक आदेश के विवाद का नहीं, बल्कि राजस्व न्यायालय की कार्यवाही में रिकॉर्ड की पारदर्शिता और विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है।
जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
फिलहाल उपलब्ध दावों के आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी पर अनियमितता का अंतिम आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन एक ही प्रकरण में 18 जून के कथित ऑफलाइन आदेश और 10 सितंबर के ऑनलाइन आदेश का सामने आना अपने आप में गंभीर जांच का विषय है।अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर हैं। सवाल सीधा है—एक ही प्रकरण में दो आदेश आखिर कैसे सामने आए? 18 जून की कार्यवाही ऑनलाइन रिकॉर्ड में क्यों नहीं दिखी? और संबंधित पक्ष को वास्तव में नोटिस मिला था या नहीं?
इन सवालों का जवाब मूल केस फाइल और आदेशशीट की निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।




