भारत और दक्षिण अमेरिकी देश चिली के बीच रिश्ते अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहने वाले हैं. दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) अंतिम चरण में पहुंच चुका है और इसी के साथ भारत के लिए लिथियम, कॉपर और कोबाल्ट जैसे क्रिटिकल मिनिरल्स का बड़ा दरवाजा खुलता दिखाई दे रहा है. ये वही खनिज हैं, जिन पर भविष्य की इलेक्ट्रिक गाड़ियां, बैटरी उद्योग, सेमीकंडक्टर निर्माण और ग्रीन एनर्जी सेक्टर टिका हुआ है.
खबर है कि चिली भारतीय कंपनियों को अपने यहां ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड खनन परियोजनाओं में निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. चिली चाहता है कि भारत केवल खनिज खरीदार बनकर न रहे, बल्कि वहां की खदानों में निवेश कर लंबे समय के लिए सप्लाई चेन विकसित करे. इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी.
चिली के पास बड़ा खनिज भंडार
चिली के पास दुनिया के 20 प्रतिशत से ज्यादा कॉपर भंडार मौजूद हैं. इसके अलावा वैश्विक लिथियम भंडार का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा भी चिली में है. लिथियम उत्पादन के मामले में यह दुनिया के सबसे बड़े देशों में गिना जाता है. कोबाल्ट के क्षेत्र में भी वहां पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी उद्योग के विस्तार के साथ इन खनिजों की मांग कई गुना बढ़ने वाली है. ऐसे में भारत के लिए इन संसाधनों तक सीधी पहुंच हासिल करना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
तेजी से बढ़ रही बातचीत
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और चिली इस वर्ष की तीसरी या चौथी तिमाही तक CEPA को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रहे हैं. हाल ही में दोनों देशों ने इस समझौते के लिए टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) पर हस्ताक्षर भी किए हैं.
भारत की प्राथमिकता लिथियम और कॉपर जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के खनन ब्लॉकों तक दीर्घकालिक और अनुकूल पहुंच सुनिश्चित करना है. इससे देश के EV, बैटरी और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को कच्चे माल की स्थायी उपलब्धता मिल सकेगी.
चीन पर निर्भरता घटाने की दिशा में बड़ा कदम
दुनिया भर में क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई को लेकर चीन का प्रभाव काफी मजबूत माना जाता है. भारत लंबे समय से ऐसे वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में है, जिससे रणनीतिक खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित रह सके.
विशेषज्ञों का कहना है कि चिली के साथ मजबूत साझेदारी भारत को खनिज आपूर्ति के नए स्रोत उपलब्ध करा सकती है. इससे चीन पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को विविध बनाने में मदद मिल सकती है. यही वजह है कि इस समझौते को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी बेहद अहम माना जा रहा है.
‘साउथ अमेरिका की सिलिकॉन वैली’ बनना चाहता है चिली
चिली सिर्फ खनन क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है. चिली खुद को दक्षिण अमेरिका की ‘सिलिकॉन वैली’ के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहा है और भारतीय इंजीनियरों तथा तकनीकी विशेषज्ञों को वहां अवसर देने के लिए उत्सुक है.
चिली सरकार का मानना है कि उसके पास मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी और निवेश के लिए अनुकूल माहौल मौजूद है. ऐसे में भारतीय प्रतिभाओं के लिए वहां नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
भारत के लिए क्यों है यह डील इतनी अहम?
भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है. इसके लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, बैटरी स्टोरेज, सोलर ऊर्जा और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश हो रहे हैं. इन सभी उद्योगों की रीढ़ लिथियम, कॉपर और कोबाल्ट जैसे खनिज हैं.
अगर भारत और चिली के बीच CEPA समझौता तय समय पर पूरा हो जाता है, तो भारत को इन महत्वपूर्ण संसाधनों की स्थिर और दीर्घकालिक आपूर्ति मिल सकती है. इससे देश के EV मिशन, चिप निर्माण और ग्रीन एनर्जी कार्यक्रम को जबरदस्त गति मिल सकती है. वहीं चिली को भारतीय निवेश, तकनीक और विशाल बाजार का लाभ मिलेगा. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच यह साझेदारी आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

