SECL, प्रशासन और जिम्मेदारों पर उठे सवाल— आखिर किसी मासूम की जान जाने के बाद ही जागेगा सिस्टम?
चंद्रिका कुशवाहा, सूरजपुर/प्रतापपुर
छत्तीसगढ़ सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन सूरजपुर जिले के प्रतापपुर क्षेत्र से सामने आई एक तस्वीर उन दावों की हकीकत बयां कर रही है। यहां ग्राम सुखदेवपुर में पिछले करीब तीन महीनों से अधूरा पड़ा रपटा निर्माण अब ग्रामीणों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। बरसात शुरू होते ही नदी उफान पर है और इसी उफनती धारा को पार कर मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचना पड़ रहा है। सबसे दर्दनाक दृश्य तब सामने आया, जब एक परिजन तेज बहाव वाली नदी में बच्चे को अपने कंधे पर बैठाकर पार कराते हुए दिखाई दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया है।
वीडियो देखकर हर किसी की सांसें थम गईं। नदी की तेज धारा, फिसलन भरे पत्थर और कंधे पर बैठा मासूम… यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि प्रतापपुर क्षेत्र की कड़वी हकीकत है। थोड़ी सी चूक पूरे परिवार की जिंदगी उजाड़ सकती थी। लेकिन शिक्षा के प्रति बच्चों और अभिभावकों का जज्बा ऐसा है कि वे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि नदी पर बन रहा रपटा लगभग तीन महीने पहले शुरू हुआ था, लेकिन निर्माण कार्य बीच में ही छोड़ दिया गया। यदि समय पर कार्य पूरा कर लिया जाता तो आज किसी को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ती। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर निर्माण कार्य क्यों रुका? जिम्मेदार एजेंसी कौन है? और आखिर किसकी लापरवाही का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है?
ग्रामीणों ने SECL, संबंधित निर्माण एजेंसी और प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि विकास कार्यों के नाम पर केवल घोषणाएं होती हैं, लेकिन धरातल पर हालात बद से बदतर हैं। बरसात शुरू होने के बाद भी अधूरे निर्माण को पूरा कराने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। यही कारण है कि ग्रामीणों, महिलाओं, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को रोजाना उफनती नदी पार करनी पड़ रही है।
सबसे अधिक चिंता स्कूली बच्चों को लेकर है। अभिभावकों का कहना है कि यदि बच्चे स्कूल नहीं भेजें तो उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, और भेजें तो हर दिन उनकी जान की चिंता सताती है। वायरल वीडियो ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। सोशल मीडिया पर लोग तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि क्या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई हादसा हो जाता है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद अधूरा रपटा पूरा कराया जाएगा? लोगों का आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि अब तक मौके पर पहुंचकर हालात का जायजा लेने तक नहीं आए हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि अधूरे पड़े रपटा निर्माण को तत्काल पूरा कराया जाए, निर्माण में हुई देरी की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए तथा बरसात के दौरान सुरक्षित आवागमन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब आम लोगों की सुरक्षा और मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित हों।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रतापपुर क्षेत्र में विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर मासूम बच्चे उफनती नदी की तेज धार के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने को मजबूर हैं। वायरल वीडियो ने प्रशासनिक व्यवस्था, निर्माण एजेंसियों और जिम्मेदार तंत्र की कार्यशैली पर बहस छेड़ दी है।
नोट: यदि यह रिपोर्ट प्रकाशित की जाए तो यह स्पष्ट रूप से उल्लेख करना उचित होगा कि SECL या किसी अन्य एजेंसी की जिम्मेदारी और लापरवाही संबंधी आरोप ग्रामीणों द्वारा लगाए गए हैं। जब तक संबंधित एजेंसी या प्रशासन की आधिकारिक पुष्टि या जांच रिपोर्ट उपलब्ध न हो, इन्हें आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

