सूरजपुर : मौत का तार या विभागीय लापरवाही? केवरा जंगल में खत्म हो गया पूरा भालू परिवार, तीन मौतों ने हिलाई वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था
हाई वोल्टेज लाइन बनी काल, मादा भालू, नर भालू और शावक की दर्दनाक मौत; वन विभाग और बिजली विभाग दोनों पर उठे गंभीर सवाल
चंद्रिका कुशवाहा ,सूरजपुर
सूरजपुर जिले के प्रतापपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत पार्वतीपुर के कक्ष क्रमांक पी-17 स्थित झिंगरामाड़ा जंगल में हुई एक दर्दनाक घटना ने वन्यजीव संरक्षण की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है। जंगल में टूटकर गिरे हाई वोल्टेज बिजली तार की चपेट में आने से एक पूरे भालू परिवार का अंत हो गया। करंट लगने से एक मादा भालू, एक नर भालू और उसका मासूम शावक मौके पर ही मौत के मुंह में समा गए। इस घटना ने न केवल वन्यजीव प्रेमियों को झकझोर दिया है बल्कि वन विभाग और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार जंगल क्षेत्र से होकर गुजरने वाली उच्च क्षमता की विद्युत लाइन का तार टूटकर जमीन पर गिरा हुआ था। बारिश और नमी के कारण पूरे क्षेत्र में करंट फैल रहा था। इसी दौरान भोजन और पानी की तलाश में जंगल में विचरण कर रहा भालुओं का परिवार अनजाने में इस मौत के जाल की चपेट में आ गया। तेज करंट लगने से तीनों वन्यजीवों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।
सुबह जंगल पहुंचे ग्रामीणों ने जब भालुओं के शव देखे तो क्षेत्र में सनसनी फैल गई। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पंचनामा कार्रवाई शुरू की। लेकिन सवाल यह है कि जिस बिजली तार ने तीन वन्यजीवों की जान ले ली, वह आखिर कब से जमीन पर गिरा हुआ था और संबंधित विभागों को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?
क्या वन विभाग और बिजली विभाग हादसे का इंतजार कर रहे थे?
ग्रामीणों का आरोप है कि जंगलों से गुजरने वाली बिजली लाइनों की न तो नियमित निगरानी होती है और न ही समय-समय पर सुरक्षा परीक्षण कराया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर तार झूल रहे हैं और खंभों की स्थिति भी खराब है। यदि समय रहते निरीक्षण और मरम्मत की जाती तो आज एक पूरा भालू परिवार जिंदा होता।
वन्यजीवों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले वन विभाग पर भी सवाल उठ रहे हैं। जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियों की लगातार निगरानी की बात कही जाती है, लेकिन जिस क्षेत्र में हाई वोल्टेज तार जमीन पर पड़ा था, वहां खतरे को चिन्हित क्यों नहीं किया गया? क्या विभागीय तंत्र केवल कागजों में ही सक्रिय है?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े जानकारों का कहना है कि जंगलों से गुजरने वाली विद्युत लाइनों का संयुक्त निरीक्षण वन विभाग और बिजली विभाग को नियमित रूप से करना चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में इंसुलेटेड तार, चेतावनी प्रणाली और त्वरित मरम्मत व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्थाएं अक्सर दिखाई नहीं देतीं।
यह पहला मामला नहीं है जब करंट की चपेट में आकर वन्यजीवों की मौत हुई हो। इससे पहले भी हाथी, भालू और अन्य दुर्लभ वन्यजीव बिजली तारों, अवैध करंट और विद्युत दुर्घटनाओं का शिकार होते रहे हैं। हर घटना के बाद जांच और कार्रवाई की बातें होती हैं, लेकिन हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता।
झिंगरामाड़ा जंगल की यह घटना केवल तीन वन्यजीवों की मौत नहीं है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण तंत्र की गंभीर विफलता का प्रतीक बन गई है। एक साथ नर भालू, मादा भालू और शावक की मौत से स्थानीय वन्यजीव आबादी को भी गहरा नुकसान पहुंचा है।
अब क्षेत्र के ग्रामीण, पर्यावरण प्रेमी और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोग मांग कर रहे हैं कि इस मामले में केवल औपचारिक जांच न हो, बल्कि यह तय किया जाए कि बिजली तार टूटकर जमीन पर कैसे पड़ा रहा, किसकी जिम्मेदारी थी और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।
जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक जंगलों में बिछे ऐसे मौत के तार किसी और बेजुबान की जिंदगी छीनते रहेंगे।

