अम्बिकापुर सरगुजा
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By sudeep upadhyay
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में हाल के दिनों में महिलाओं और युवतियों के साथ छेड़छाड़, दुष्कर्म तथा सामूहिक दुष्कर्म जैसी घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। अंबिकापुर और बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर क्षेत्र में सामने आए मामलों ने एक बार फिर समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इन घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा होगा। यह घटनाएं उस सामाजिक और मानसिक विकृति की ओर संकेत करती हैं, जो धीरे-धीरे हमारे बीच पनप रही है।किसी भी सभ्य समाज की पहचान महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता से होती है। जब सार्वजनिक स्थानों पर महिलाएं और युवतियां स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगें, तब यह केवल एक व्यक्ति या परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता का विषय बन जाता है। ऐसे अपराध न केवल पीड़ित परिवार को जीवनभर का दर्द देते हैं, बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों पर भी गहरा आघात पहुंचाते हैं।हर बार ऐसी घटनाओं के बाद समाज में आक्रोश देखने को मिलता है। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आती हैं, धरना-प्रदर्शन होते हैं और शासन-प्रशासन पर सवाल उठाए जाते हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना आवश्यक है, लेकिन यह भी समझना होगा कि अपराध का जन्म पुलिस थाने या प्रशासनिक कार्यालय में नहीं होता। अपराध की शुरुआत उस विकृत सोच से होती है, जो महिलाओं को सम्मान और समानता की दृष्टि से देखने के बजाय उन्हें वस्तु समझने लगती है। जब परिवारों में संस्कार कमजोर पड़ने लगें, नैतिक शिक्षा का महत्व घटने लगे और समाज गलत व्यवहार को अनदेखा करने लगे, तब ऐसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं।
हालिया मामलों में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया और उन्हें कानून के दायरे में लाने का काम किया है। यह बताता है कि शासन और पुलिस अपराधियों के प्रति कठोर रुख अपनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अपराध घटित होने के बाद पुलिस की जिम्मेदारी अपराधियों को पकड़ना और न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, जिसे कई मामलों में प्रभावी ढंग से निभाया गया है। इसलिए हर घटना के लिए केवल पुलिस या शासन को दोषी ठहराना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
वास्तविक प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी मानसिकता विकसित क्यों हो रही है? विशेषज्ञों और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार महिलाओं के प्रति गलत दृष्टिकोण, पुरुष प्रधान सोच, कानून का भय कम होना, सामाजिक जागरूकता की कमी, नशे की प्रवृत्ति, इंटरनेट और सोशल मीडिया का दुरुपयोग, अश्लील सामग्री की आसान उपलब्धता तथा नैतिक मूल्यों में गिरावट जैसे अनेक कारक ऐसे अपराधों को बढ़ावा देते हैं। यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है।
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को लेकर लगातार चिंता व्यक्त करते रहे हैं। यह स्पष्ट है कि केवल कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। कानून अपराधियों को सजा दे सकता है, लेकिन समाज के भीतर पनप रही विकृत सोच को समाप्त नहीं कर सकता। इसके लिए परिवार, विद्यालय, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएं और समाज के जागरूक नागरिकों को आगे आना होगा।
आज आवश्यकता है कि बच्चों और युवाओं को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और महिलाओं के प्रति सम्मान का पाठ भी पढ़ाया जाए। माता-पिता को अपने बच्चों के व्यवहार और संगति पर ध्यान देना होगा। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लैंगिक समानता, महिला सुरक्षा और संवैधानिक मूल्यों पर नियमित संवाद होना चाहिए। समाज के प्रभावशाली लोगों को भी ऐसे मुद्दों पर खुलकर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
शासन और प्रशासन को भी व्यापक स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। गांवों से लेकर शहरों तक महिला सम्मान, कानूनी प्रावधानों और सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर निरंतर कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। पुलिस की सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम चलाने और समाज को कानून के प्रति जागरूक बनाने की दिशा में और अधिक प्रयास किए जाने चाहिए।
यह समय केवल अपराधियों को कोसने या सोशल मीडिया पर आक्रोश व्यक्त करने का नहीं है। यह समय आत्ममंथन का है। हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम अपने घरों, मोहल्लों और समाज में ऐसी सोच के खिलाफ पर्याप्त आवाज उठा रहे हैं? क्या हम महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार को बढ़ावा दे रहे हैं? क्या हम अपने बच्चों को सही संस्कार दे पा रहे हैं?


