रेत के समंदर में बही ‘दूध की गंगा’! 63 गांवों से रोज हजारों लीटर दूध का संग्रह
Last Updated:June 01, 2026, 11:21 IST
Dairy Farming Rajasthan: विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों से एक प्रेरणादायक सफलता की कहानी सामने आई है. रेत और सूखे के लिए पहचान रखने वाले इलाके में आज 63 गांवों से प्रतिदिन लगभग 40 हजार लीटर दूध का संग्रह किया जा रहा है. इस दुग्ध उत्पादन से किसानों और पशुपालकों को रोजाना करीब 24 लाख रुपये की आय प्राप्त हो रही है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिली है. डेयरी गतिविधियों ने ग्रामीण परिवारों के लिए नियमित आय का स्रोत तैयार किया है और पशुपालन को लाभदायक व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है. आधुनिक डेयरी प्रबंधन, सहकारी समितियों की सक्रिय भूमिका और पशुपालकों की मेहनत ने इस क्षेत्र को दुग्ध उत्पादन का मजबूत केंद्र बना दिया है.
रेगिस्तान में अब सिर्फ रेत ही नहीं बल्कि दूध की भी बहार नजर आ रही है. मरु उड़ान डेयरी परियोजना के तहत बाड़मेर के 63 गांवों के पशुपालक रोजाना करीब 40 हजार लीटर दूध बेच रहे हैं. गांवों में लगाए गए 50 बल्क मिल्क कूलरों की मदद से दूध की गुणवत्ता बनाए रखी जा रही है. इससे पशुपालकों को हर दिन 24 लाख रुपये से अधिक की आय हो रही है. विश्व दुग्ध दिवस पर यह पहल थार में डेयरी आधारित आर्थिक बदलाव की मिसाल बनकर उभरी है.
डेयरी परियोजना से जुड़ी श्योर संस्था की सचिव लता कछवाह का कहना है कि डेयरी गतिविधियों से जुड़ने के बाद महिलाओं के हाथ में नियमित आय आने लगी है. इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है बल्कि परिवार और समुदाय में उनकी भूमिका भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है. स्वयं सहायता समूहों और डेयरी समितियों के माध्यम से महिलाएं नेतृत्व और वित्तीय प्रबंधन से भी जुड़ रही हैं.
दुग्ध समितियों में बड़ी संख्या में महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं. दूध संग्रहण, रिकॉर्ड संधारण और समितियों के संचालन में उनकी भूमिका ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है. परियोजना से जुड़ी महिला पशुपालक संतोष कंवर बताती हैं कि पहले हमारा जीवन घर और पशुओं की देखभाल तक सीमित था. आय का कोई साधन नहीं था. अब दूध बेचकर हम भी घर के खर्च में योगदान दे रहे हैं. इसके साथ ही दूध से बने उत्पाद जैसे घी, पनीर और मावा बनाकर भी बेच रहे हैं.
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मरु उड़ान डेयरी परियोजना के तहत बाड़मेर के 63 गांवों में दुग्ध सहकारी समितियां संचालित हैं. यहां पशुपालक सुबह-शाम दूध लेकर समितियों तक पहुंचते हैं, जहां उसका संग्रहण किया जाता है. 6600 से अधिक किसान डेयरी परियोजना से जुड़े हुए है.
गांवों में 50 बल्क मिल्क कूलर स्थापित किए गए हैं. इन कूलरों में दूध को निर्धारित तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है जिससे गुणवत्ता बनी रहती है और खराब होने की संभावना कम होती है. वेदांता ऑयल केन्ड गैस केयर्न की मरु उड़ान डेयरी परियोजना से जुड़े गांवो में महिलाएं स्वेत क्रांति ला रही है.
इस परियोजना के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 40 हजार लीटर दूध इकठ्ठा किया जा रहा है. यह दूध स्थानीय स्तर से लेकर बड़े बाजारों तक पहुंच रहा है जिससे पशुपालकों को नियमित आय मिल रही है. दूध बेचने वाले पशुपालकों को प्रतिदिन 24 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया जा रहा है. इससे हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है.

