अब शिकायतकर्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका की तैयारी में, कार्रवाई नहीं होने पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग तेज
चंद्रिका कुशवाहा,सूरजपुर
प्रतापपुर के सरनापारा में निर्माणाधीन एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (EMRS) भवन निर्माण कार्य को लेकर सूचना के अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त दो अलग-अलग जांच प्रतिवेदनों ने करोड़ों रुपये की इस परियोजना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसडीएम प्रतापपुर के नेतृत्व में गठित 7 सदस्यीय जांच दल ने दो अलग-अलग समय पर किए गए निरीक्षण में निर्माण कार्य में अनेक तकनीकी, गुणवत्ता संबंधी एवं संरचनात्मक खामियां दर्ज की हैं। जांच प्रतिवेदन के अनुसार कुछ कमियां इतनी गंभीर प्रकृति की हैं कि संबंधित हिस्सों को ध्वस्त (डिस्मेंटल) कर पुनर्निर्माण करने की आवश्यकता तक पड़ सकती है। इसके बावजूद आज तक किसी जिम्मेदार अधिकारी, निर्माण एजेंसी या ठेकेदार पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और निर्माण कार्य लगातार जारी है। अब शिकायतकर्ता चंद्रिका कुशवाहा एवं मनीष गुप्ता प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होने से निराश होकर पूरे मामले में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।
पहली जांच 29 सितंबर 2025 को कलेक्टर (आदिवासी विकास) सूरजपुर के आदेश पर एसडीएम प्रतापपुर की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय जांच समिति द्वारा की गई थी। इसके बाद दूसरी जांच 9 जून 2026 को कलेक्टर (आदिवासी विकास) के 1 जून 2026 के आदेश के पालन में कार्यपालन अभियंता, लोक निर्माण विभाग, अनुविभागीय अधिकारी एवं साइट इंजीनियर की उपस्थिति में संपन्न हुई। दोनों जांच प्रतिवेदनों में कई समान तकनीकी कमियां दर्ज होने से निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
पहली जांच में स्कूल ब्लॉक, बालक एवं बालिका छात्रावास तथा वार्डन भवन में एक्सपेंशन जॉइंट मानक के अनुरूप नहीं पाए गए। कई स्थानों पर स्लैब नीचे दबे मिले, ईंट चिनाई में सीमेंट मसाले की मोटाई निर्धारित मानक से अधिक पाई गई तथा पर्याप्त क्योरिंग नहीं होने की बात दर्ज की गई। जांच समिति ने स्पष्ट उल्लेख किया कि ऐसी स्थिति भविष्य में भवन में दरारें, प्लास्टर उखड़ने और मजबूती प्रभावित होने का कारण बन सकती है।
प्रतिवेदन में यह भी दर्ज है कि हाफ ब्रिक वॉल में आवश्यक स्टील का उपयोग नहीं किया गया। बीम और कॉलम में कंक्रीट मिश्रण में बालू की मात्रा अधिक प्रतीत हुई। कई कॉलमों में आवश्यक कवर नहीं मिला तथा अनेक स्थानों पर हनीकॉम्बिंग पाई गई। ब्लॉक-03 के रैंप के कॉलम को तोड़कर पुनः निर्माण कराने की अनुशंसा भी जांच दल ने की। कुछ स्थानों पर प्लिंथ निर्माण भी मानक के अनुरूप नहीं पाया गया।
करीब आठ माह बाद हुई दूसरी जांच में भी कई गंभीर कमियां दोबारा सामने आईं। मुख्य प्रवेश द्वार के स्लैब बीम में सेंटरिंग की त्रुटि, ब्रिकवर्क में खराब जॉइंट, किचन शेड के दो कॉलमों का प्लंब लाइन (वर्टिकल) में नहीं होना, छात्रावास में टूटी टाइल्स, दरवाजों एवं खिड़कियों के क्षतिग्रस्त हिस्से तथा प्लास्टर कार्य में फिनिशिंग की कमी दर्ज की गई।
जांच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि फ्लाई ऐश ईंटों को पानी में भिगोए बिना उपयोग किया जा रहा था, जिससे भविष्य में दीवारों में दरार आने और मजबूती प्रभावित होने की आशंका है। निर्माण स्थल पर एक समान आकार की ईंटों का उपयोग नहीं पाया गया। साथ ही ब्रिक मेसनरी एवं कंक्रीट जॉइंट पर चिकन मेश लगाने तथा प्लास्टर से पहले आवश्यक सुधार करने की अनुशंसा की गई।
जांच रिपोर्ट के अनुसार निर्माण एजेंसी WAPCOS द्वारा पर्याप्त तकनीकी कर्मचारियों की तैनाती नहीं किए जाने की बात भी सामने आई। समिति ने स्पष्ट टिप्पणी की कि पर्याप्त तकनीकी निगरानी के अभाव में गुणवत्तापूर्ण निर्माण होता प्रतीत नहीं हो रहा है।
आरटीआई से प्राप्त प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख है कि कॉलम का सीधा नहीं होना, बिना बेस कंक्रीट स्लैब ढलाई तथा अन्य संरचनात्मक खामियां गंभीर पाए जाने पर संबंधित हिस्सों को ध्वस्त (डिस्मेंटल) कर पुनर्निर्माण करने की आवश्यकता पड़ सकती है। जांच दल ने सभी कमियों को दूर कर निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप निर्माण कराने के निर्देश भी दिए थे।
उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ता चंद्रिका कुशवाहा एवं मनीष गुप्ता की शिकायत पर 13 जून 2026 को सरगुजा संभाग आयुक्त कार्यालय ने भी तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। उस निरीक्षण में भी निर्माण गुणवत्ता, बीम, किचन स्ट्रक्चर, तकनीकी दस्तावेज, सुरक्षा व्यवस्था एवं निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की विस्तृत जांच की गई थी।
मामले का एक अन्य गंभीर पहलू निर्माण में उपयोग हुई रेत को लेकर भी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निर्माण कार्य में लगभग 4700 से अधिक ट्रैक्टर रेत का उपयोग किया गया, जबकि वैध पिटपास एवं रॉयल्टी दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। शिकायतों के बावजूद अब तक खनिज विभाग की ओर से किसी प्रभावी जांच या कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह विद्यालय भविष्य में आदिवासी क्षेत्र के सैकड़ों छात्र-छात्राओं का आवासीय शिक्षण संस्थान बनेगा। ऐसे में यदि निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल सही साबित होते हैं तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यार्थियों की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ जाएगा।
लगातार दो जांच प्रतिवेदनों, संभागीय जांच और आरटीआई से सामने आए तथ्यों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से अब प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने शासन-प्रशासन के सभी स्तरों पर शिकायत की, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। अब वे पूरे मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से कोर कटिंग टेस्ट, स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी टेस्ट और गुणवत्ता परीक्षण कराया जा सके तथा दोषी अधिकारियों, निर्माण एजेंसी और संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दो-दो जांचों में गंभीर खामियां दर्ज हो चुकी हैं, तब भी करोड़ों रुपये का यह निर्माण कार्य बिना रोक-टोक आखिर किसके संरक्षण में जारी है?

